बैंक इम्प्लॉइज फेडरेशन ऑफ़ इंडिया का 42वां स्थापना दिवस 15 अक्टूबर को
पटना । आगामी 15 अक्टूबर को पूरे देश बैंक इम्प्लॉइज फेडरेशन ऑफ़ इंडिया का 42वां स्थापना दिवस आयोजित किया जायेगा। इस संबंध में फेडरेशन के महासचिव रंजन राज ने कहा कि अपनी स्थापना काल से ही बैंक इम्प्लॉइज फेडरेशन ऑफ़ इंडिया कर्मचारियों के मुद्दों के साथ साथ बैंको के निजीकरण के खिलाफ संघर्ष करता रहा है। केंद्र में सत्तारूढ़ सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) के निजीकरण के अपने एजेंडे पर आगे बढ़ रही है।
सार्वजानिक क्षेत्र के बैंको की छवि को ख़राब करने के उद्देश्य से कर्मचारियों की संख्या में भारी कटौती की जा रही है जिससे ग्राहक सेवा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। इसलिए,जब पिछले कुछ वर्षों में व्यवसाय और अन्य कार्यों में कई गुना वृद्धि हुई है, खर्च घटाने के नाम पर नियुक्ति बंद कर के बैंकिंग उद्योग में कर्मचारियों की भारी कमी की समस्या पैदा की जा रही है । लेकिन उद्योगपतियों के ऋणों को माफ़ कर दिया जाता है। सिर्फ
पिछले सात वर्षों में रु.10.7 लाख करोड़ का कर्ज माफ़ किया गया है। 2017 में एस बी आई द्वारा एसोसिएट बैंकों का अधिग्रहण किए जाने के बाद से 65000 कर्मचारियों और अधिकारियों की कमी हो गई है। 2014-15 और 2022-23 के बीच सार्वजानिक क्षेत्र के बैंको के कर्मचारियों की
संख्या में 103000 की कमी हुई है, विशेष रूप से श्रमिक संवर्ग में 117000 की कमी हुई है। ग्रामीण बैंक, रिजर्व बैंक, नाबार्ड, सहकारी बैंकों, निजी और विदेशी बैंकों की शाखाएं/कार्यालय कोई अपवाद नहीं हैं।
वर्तमान में, बैंक कर्मचारियों और अधिकारियों को नियमित बैंकिंग कार्यों के अलावा मार्केटिंग, थर्ड पार्टी उत्पाद बिक्री जैसे कई कार्य करने के लिए मजबूर किया जाता है। इससे उनकी मानसिक और शारीरिक शक्ति पर दिन-ब-दिन बुरा प्रभाव पड़ रहा है। 5-दिवसीय बैंकिंग सप्ताह के कार्यान्वयन में देरी से कार्य-जीवन संतुलन बिगड़ रहा है, जिससे असहनीय तनाव पैदा हो रहा है और आये दिन बैंक कर्मियों की आत्महत्या की घटनाएँ बढ़ रही हैं। बैंक कर्मचारियों और अधिकारियों द्वारा दिन का काम पूरा करने के लिए देर रात तक बैठने के कई उदाहरण हैं।
पहले से सूचित करने के बाद भी बार-बार छुट्टियाँ देने से इनकार किया जा रहा है। निर्धारित समय से अधिक काम करने के लिए ओवरटाइम भत्ता, जो उद्योग स्तर के समझौते के अनुसार काम करने वाले कर्मचारियों का अधिकार है, अधिकारियों द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है। सभी पदनामों के कामगार कर्मचारियों को उनकी सेवा शर्तों से परे भी काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। डिजिटल बैंकिंग शुरू करके कर्मचारियों की संख्या को और कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
स्थायी कैडर में आवश्यक संख्या में कर्मचारियों की भर्ती करने के बजाय, बैंक अस्वास्थ्यकर उपाय अपना रहे हैं। अधिकांश निजी बैंक ‘कंपनी की लागत’ के आधार के साथ-साथ निश्चित अवधि के लिए अनुबंध के आधार पर भर्ती कर रहे हैं। सार्वजानिक क्षेत्र के बैंक रोजमर्रा के बैंकिंग कार्यों के लिए प्रशिक्षुओं और संविदा अधिकारियों को भी नियुक्त कर रहे हैं। इसके अलावा, शाखाओं/कार्यालयों में हजारों अस्थायी कर्मचारियों को मामूली धनराशि देकर काम कराया जाता है। बैंकों द्वारा लाखों बिजनेस कॉरेस्पॉन्डेंट्स को मामूली कमीशन देकर विभिन्न प्रकार के कई काम करने के लिए नियुक्त किया गया है,जिनका खुलेआम अमानवीय शोषण किया जा रहा है। सभी प्रकार की स्थायी नौकरियों को अब आउटसोर्स किया जा रहा है, जिससे सेवा की गुणवत्ता में कमी आ रही है और गोपनीयता से समझौता हो रहा है।
हमारे देश में बेरोजगारी अप्रत्याशित रूप से बढ़ रही है। यह बहुत चिंता का विषय है कि सरकार बैंकिंग उद्योग में देश के लाखों बेरोजगार युवाओं के लिए दरवाजे बंद कर रही है। लगभग सभी बैंकों ने अधीनस्थ कर्मचारियों
और सफाईकर्मियों की भर्ती लगभग बंद कर दी है। कुछ बैंकों ने बारहमासी नौकरियों को आउटसोर्स करने के लिए सहायक कंपनियों का गठन किया है।
बैंक इम्प्लॉइज फेडरेशन ऑफ़ इंडिया सभी बैंकिंग संस्थानों में स्थायी प्रकृति के पदों पर सभी संवर्गों में पर्याप्त भर्ती की मांग को लेकर संघर्ष करने का संकल्प लिया गया। साथ ही साथ बिजनेस कॉरेस्पॉन्डेंट्स के शोषण ख़त्म करने, अस्थायी कर्मचारियों की सेवा नियमित करने के लिए तथा आउटसोर्सिंग का विरोध करने का संकल्प लिया गया। केंद्रीय समिति ने उद्योग स्तर के समझौते के अनुसार उचित मुआवजे के बिना निर्धारित कार्यावधि के बाद बैंक कर्मचारियों से काम लेने का विरोध करने का निर्णय लिया।
