विचार : कोरोना सचेतन के लिए गाँव और बस्ती में तकनीकी संचार नहीं, भारतीय परंपरा संचार की जरूरत है- सद्दाम हुसैन

पटना (जागता हिंदुस्तान) भारत समेत लगभग सभी देश कोरोना के चलते लॉकडाउन हैं। इस महामारी में लोगों ने घर बंदी होकर तकनीक के द्वारा पूरी दुनिया का वर्चुअल भ्रमण और काम-काज कर रहे हैं। हम सब जानते हैं मार्शल मैकलुहान की अवधारणा ग्लोबल विलेज़ (Global Village) के अनुसार इंटरनेट ने दुनिया को एक खगोलीय गाँव में बदल दिया है। यही वजह है कि एक अदृश्य वायरस- कोरोना ने विश्व में तहलका मचा दिया। मीडिया के अंदर भी कोरोना वायरस ने तहलका मचा दिया है। समाज में मीडिया जिस तरह तथ्यों की जानकारी देने में अहम भूमिका निभा रहा है उसी तरह तथ्यों को भ्रमित करने में भी आगे है।
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए लोग ‘सोशल डिस्टेंस’ का अनुसरण कर रहे हैं लेकिन सोशल मीडिया से वे दूर नहीं। यही सोशल मीडिया और कुछ दृश्य-श्रव्य माध्यम इस महामारी के दौरान समाज के लिए खतरनाक वायरस बन चुके हैं। अभी ज़्यादातर लोग घर में टाइम पास के लिए मोबाइल को ही एक आवश्यक उपकरण के रूप में इस्तेमाल कर हैं। दुनिया वाकई बहुत तेजी से बदल रही है। मानव सभ्यता आज तकनीक से लैस है। 21 वीं सदी में शहर से लेकर गाँव तक, नौकरीजीवी से लेकर श्रमिक तक सब के पास संचार करने और तथ्य जानकारी के लिए मोबाइल ही सहारा बन गया हैं। बहरहाल, पुलिस प्रशासन से लेकार बाकी सरकारी प्रशासन संबंधित सभी जानकारियों के लिए भी मोबाइल संचार के लिए एक अहम भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन सबसे ज्यादा खतरनाक बन गया है कि ज़्यादातर खबरों को अपनी तरह तोड़-मोड़कर नकारात्मक दृष्टिकोण से सोचते हुई उसे टिकटोक, व्हाट्सआप, यूट्यूब और फ़ेसबूक के जरिये प्रसारित कर अफवाहें फैलाई जा रही हैं। इन सभी गेट कीपिंग सिद्धांत को बहुत अच्छी तरह इस्तेमाल करते हुई समाज में एक कोरोना से भी खतरनाक वायरस फैल रहा है जो कि “मीडिया वायरस” के रूप में हमारे सामने उभरकर आया है। सन 2010 में सोशाल मीडिया समाज के लिए सचमुच सामाजिक मीडिया था जो समाज में एक दूसरे की आशाओं का प्रतीक बन कर उभर रहा था, परंतु सन 2020 आते-आते वह फ़ेक न्यूज़ और सामाजिक माहौल बिगाड़ने जैसे आरोपों से घिर गया है। इससे सबसे ज्यादा एक अनपढ़ समाज प्रभावित हो रहा है, ख़ासकर गाँव में रहने वाले समाज में, शहर के बस्ती मे रहने वाले, आदिवासी समाज में जहां लोग अनपढ़ लोगों की संख्या अधिक है। कोरोना से संबंधित सभी घटनाएं इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इस समाज में सबसे ऐसी खबरें फ़ैलाई जा रही हैं जिसे कुछ विद्वान लोग जांच कर फ़ेक कह रहे हैं। लेकिन गाँव और बस्ती में रहने वाले 99 % लोगों के लिए सभी फ़ेक न्यूज़ ‘सच’ होती हैं।

आज देश को एकजुट होकर लड़ने की आवश्यकता है। सरकार से आग्रह है कि कृपया ऐसी कोई खबर या जानकारी इस तरह से न दें कि जमीनी स्तर पर लोगों में भेदभाव हो। हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें ‘मौलवी प्रेरित कर रहे हैं कि मरने के लिए मस्जिद से बेहतर जगह नहीं हो सकती।’ ऐसे और भी कई वीडियो वायरल हुए हैं जिसमे मौलवी कह रहे हैं कि नमाज़ पढने से कोरोना नहीं होगा, गो-मूत्र पीने से ठीक हो जाएगा। एक ऐसा वीडियो भी वायरल हुआ था जिसमें यह बताया जा रहा था कि मंदिर में जाके पिंड दान करने से कोरोना मुक्त हो जाएंगे। इस महामारी के समय में मीडिया की आतंकी और फ़ेक न्यूज़ से बच कर निकल पाना कोरोना से बचने से ज्यादा जरूरी और कठिन प्रतीत हो रहा है। इस लिए तकनीकी संचार को कुछ दिन के लिए दूर रखते हुई भारतीय वाचिक परंपरा संचार का सहारा लेना बेहद जरूरी है। हम सभी जानते है कि भारतीय समाज वाचिक संचार का समाज रहा है।

अमेरिकन सोसाइटी ऑफ ट्रेनिंग डायरेक्टर्स के अनुसार आपसी समझ, विश्वास व बेहतर मानव संबंध स्थापित करने की दिशा में किया गया सूचनाओं व विचारों का आदान –प्रदान ही संचार है, यानि पारंपरिक-व्यक्तिक संचार के द्वारा भी सूचनाओं व विचारों का आदान –प्रदान होता हैं। इस महामारी की परिस्थिति में गाँववासी के लिए इस तरह के संचार की बेहद जरूरत है। इस समय लॉकडाउन के कारण विशेषकर गांव और बस्ती में सभी के लिए समय को बिताने के लिए मनोरंजन और तथ्य संग्रहण का एक मात्र उपकरण सोशाल मीडिया बन चुका है। ये मनोरंजन के उपकरण घातक उपकरण के रूप में उभरकर आ रहे हैं।

परंपरागत संचार से आशय ऐसे संचार से है जो आधुनिक जनसंचार माध्यमों की बजाए परंपरागत माध्यमों से किया जाता हो। परंपरागत संचार वैयक्तिक और समूह दोनों स्तरों पर होता है। इस तरह का संचार सदियों से चला आ रहा है। परंपरागत संचार एक सहज सामाजिक प्रक्रिया है जिसमे तकनीक का कोई रहस्य नही होता है। इसमें मनुष्य के साथ मनुष्य के द्वारा ही वार्तालाप होता है, जो कि समाज में सहज, स्वाभाविक विश्वसनीय और स्वीकार्य होता है। वैदिक काल में श्रुतियां और वेद सभी कुछ वाचिक परंपरा में मौजूद था। सारा ज्ञान भी वाचिक परंपरा के माध्यम से ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता था।

महात्मा बुद्ध ने आम लोगों द्वारा बोले जाने वाली प्राकृत भाषा में अपने प्रवचन दिये ताकि जन-जन तक उनकी बात पहुंच सके। सदियों से मंदिर और मस्जिद संचार के प्रभावशाली केन्द्र रहे हैं, जहां मूर्तियों के अलावा धार्मिक कर्म-कांडों के जरिये भी सामाजिक संचार होता है।
कोरोना की वजह से लाखों लोगों में धैर्य कम हो रहा है, लोग पैनिक हो रहे हैं, डर और हताशा में लोग आत्महत्या भी कर रहे हैं। फ़र्ज़ी ख़बरों के माध्यम से साम्प्रदायिक नफ़रत भी फैलायी जा रही है। यह वक़्त नफ़रत का नहीं; धैर्य, प्रेम और सावधानी का है! इसलिए कोई भी ख़बर शेयर करने या फॉरवर्ड करने से पहले AltNews.in, PIB Fact Check, FactChecker.in जैसे सॉफ्टवेर के द्वारा तथ्यों की जांच करना आवश्यक है। साथ ही गाँव और बस्ती में आम जनता को वाचिक संचार के द्वारा सचेत करने की जरूरत है। इनके अलावा आप अपने राज्य की पुलिस और केंद्र सरकार द्वारा प्रसारित की गई प्रमाणित ख़बरों पर ही भरोसा रखें। देशभर में जगह-जगह समाज के धर्मगुरुओं और कुछ गाँव-बस्ती के शिक्षित लोगों को लोकल पुलिस, प्रशासन और जिला प्रशासक बातचीत के द्वारा तथ्यों को बताए। और इसी तथ्य को धर्मगुरु और शिक्षित लोग गाँव और बस्ती में आम जनता के सामने पेश करें और सचेत करें। सोशल डिस्टेन्स के साथ-साथ सोशल मीडिया से भी कुछ दिन के लिए डिस्टेन्स बनाएं और अफवाहें फैलाने से रोकें। आज हर गाँव में शिक्षित युवा और धर्मगुरु के लिए यह जरूरी है कि वे अपने समाज को जागरूक बनाएं। विवेकानंद ने कहा था, “उठो, जागो और स्वयं जागकर औरों को जगाओ। मुझे बहुत से युवा संन्यासी चाहिए जो भारत के ग्रामों में फैलकर देशवासियों की सेवा में खप जाएं।” भारत में आज भी बड़ी तादाद में लोग अनपढ़ और गरीब हैं। ये लोग गावों और बस्तियों में रहते हैं और परंपराओं में जीते हैं। ऐसे में इस महामारी के दैरान भारतीय परंपरागत संचार काफी प्रासंगिक और लाभकारी हैं।

सद्दाम होसैन, सहायक अध्यापक एवं स्कॉलर, पत्रिकारिता एवं जन संचार विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय।

यह लेखक के अपने नीजि विचार हैं।

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