अल्पसंख्यक व जनवादी संस्थाओं ने CM नीतीश से की मांग, सदन में NRC के खिलाफ लाएं प्रस्ताव

पटना (जागता हिन्दुस्तान) बिहार की प्रतिष्ठित अल्पसंख्यक धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं तथा धर्मनिरपेक्ष जनवादी संगठनों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बिहार में एनपीआर की प्रक्रिया आरंभ नहीं करने की मांग की है। पटना में आयोजित एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में 10 से अधिक धर्मगुरुओं एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि नीतीश कुमार कहते रहे हैं कि बिहार में एनआरसी लागू नहीं होगा। मुख्यमंत्री एनपीआर के मौजूदा फॉर्मेट पर भी असंतोष जाहिर कर चुके हैं। ऐसे में एनपीआर की प्रक्रिया पर अविलंब रोक लगाने के स्पष्ट आदेश जारी करें। धर्मगुरु एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि एनपीआर दरअसल एनआरसी की पहली सीढ़ी है।

धर्मगुरुओं एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विभिन्न दलों के नेताओं से अपील की है कि वे विधानमंडल सत्र के दौरान सीएए, एनपीआर और एनआरसी के खिलाफ आवाज बुलंद करें। साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है कि वह सदन में केरल और पंजाब की तरह एनआरसी के खिलाफ प्रस्ताव पास करें।

पत्रकारों के सवालों के जवाब देते हुए इमारत शरिया के कार्यवाहक सचिव मौलाना शिब्ली अलकासमी ने कहा कि हमने शुरू से ही इस काले कानून का विरोध किया है। सरकार से हमारी मांग की कानून को वापस ले। मौलाना शिब्ली ने कहा कि रविवार को दरभंगा के मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी में आयोजित कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने एनपीआर और एनआरसी को लेकर जो बयान दिया है हम उसका स्वागत करते हैं। मौलाना कासमी ने सीधे तौर पर कहा कि अगर एनपीआर 2010 के फॉर्मेट पर होता है तो ठीक वरना हम इसका बहिष्कार करेंगे।

वहीं लोकतांत्रिक जन पहल के संयोजक सत्यनारायण मदन ने सीधे तौर पर दरभंगा में एनपीआर और एनआरसी को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा दिए गए बयान को राजनीतिक बयान करार दिया है। उन्होंने कहा कि अगर वास्तव में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एनपीआर नहीं चाहते हैं तो उन्हें संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत केंद्र सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जाना चाहिए। मदन ने कहा कि राजनीतिक बयान से शासन नहीं चलता। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार केंद्र द्वारा बनाए गए कानून को एक तरफा बयान देकर खारिज नहीं कर सकती।

इसके साथ ही धर्मगुरुओं एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि सीएए दरअसल एनपीआर और एनआरसी से जुड़ा हुआ है और यह तीनों मिलकर घातक त्रिकोण बनाते हैं। उन्होंने कहा कि इस त्रिकोण से देश के करोड़ों गरीबों, दलितों, पिछड़ों, महिलाओं और बच्चों की नागरिकता खतरे में पड़ सकती है। इसलिए केंद्र सरकार जनता की भावनाओं का आदर करते हुए और संविधान के मूल्यों को ध्यान में रखते हुए देश हित में सीएए को वापस ले।

धर्म गुरुओं एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जब तक देश भर में नाचू लागू करने की बात चली है और नागरिकता संशोधन कानून बना है, देश का माहौल खराब हुआ है। देश को धर्म के नाम पर बांटने की कोशिश की जा रही है जिसे किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

प्रेस वार्ता में जमात इस्लामी हिंद बिहार के प्रदेश अध्यक्ष मौलाना रिज़वान अहमद इस्लाही, जमीयते उलेमा बिहार के प्रदेश महासचिव अलहाज हुस्न अहमद कादरी, खानकाह मुनिमिया के सज्जादानशीन मौलाना शमिमुद्दीन अहमद मुनैमी, स्वराज इंडिया बिहार के प्रदेश सदस्य ऋषि आनंद, बिहार राब्ता कमिटी के सचिव अफ़ज़ल हुसैन तथा ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरत के महासचिव अनवारुल होदा मौजूद रहे।

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