आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का हालिया बयान संविधान की मूल भावना के खिलाफ- माले

पटना (जागता हिंदुस्तान) सुप्रीम कोर्ट द्वारा तमिलनाडु में नीट पोस्ट ग्रेजुएशन मामले में रिजर्वेशन को लेकर की गई टिप्पणी संविधान की मूल भावना के खिलाफ है. अपनी टिप्पणी में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आरक्षण कोई बुनियादी अधिकार नहीं है. भाकपा-माले राज्य सचिव कुणाल ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणी करार देते हुए कहा कि आरक्षण की परिकल्पना सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए की गई है. यह कोई भीख में दी गई चीज नहीं है, जिसके बारे में ऐसी कोई टिप्पणी की जा सकती है.

आगे कहा कि हर कोई जानता है कि भाजपा व आरएसएस का सबसे बड़ा हमला दलितों-पिछड़ों के आरक्षण पर ही है और ये ताकतें लगातार उसे खत्म करने की कोशिश में लगी हुई रहती हैं. इनका बस चले तो ये संविधान को बदलकर मनुस्मृति का शासन देश पर थोप दें. लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपाइयों ने आरक्षण पर नया भ्रम फैलाना आरंभ कर दिया है और ऐसा लग रहा है कि वही आरक्षण बचाने के लिए प्रतिबद्ध है. दरअसल, उनको अच्छे से याद है कि विगत बिहार विधानसभा चुनाव में आरक्षण पर मोहन भागवत के विवादित बयान ने भाजपा की हार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. इसलिए, इस बार ये ताकतें बिहार में नया खेल खेल रही हैं.

भाजपा के साथ गलबहियां किए हुए रामविलास जी कहते हैं कि आरक्षण को संविधान की 9 वीं अनुसूची में डाला जाना चाहिए. सवाल यह है कि रामविलास जी यह मांग किससे कर रहे हैं? उनको यह मांग तो पहले भाजपा से करनी चाहिए. अपनी सरकार से करनी चाहिए. वे ऐसा क्यों नहीं कर रहे हैं? यदि रामविलास जी इस मसले पर सभी पार्टियों की एकता चाहते हैं, तो सबसे पहले उन्हें दलितों-पिछड़ों का आरक्षण खत्म कर देने के लिए नित्य नई चालें चलने वाली संविधान व लोकतंत्र विरोधी भाजपा से नाता तोड़ना ही होगा.

बिहार में भाजपा-जदयू ने इस बार एक नई चाल चली है. दलितों-पिछड़ों का आरक्षण खत्म करने वाले ये लोग आज आरक्षण बचाने के नाम पर सभी राजनीतिक दलों के अनुसूचित जाति व जनजाति के विधायकों को एक मंच पर आने की बात कह रहे हैं. यह मोर्चा दलितों-पिछड़ों को धोखा के सिवा कुछ नहीं है. ये ताकतें इस नाम पर दलितों-पिछड़ों का वोट ठगकर फिर से विधानसभा चुनाव जीत लेने का सपना देख रही हैं.

भाकपा-माले का भाजपा-जदयू के नेतृत्व वाले इस प्रकार के मोर्चे से कोई लेना देना नहीं है. आरक्षण को भाजपा-जदयू का विश्वासघाती ठगबंधन नहीं, बल्कि इन तोकतों के खिलाफ लड़कर ही उसे बचाया जा सकता है. भाकपा-माले विधायक सत्यदेव राम का नाम बिना उनकी सहमति के इस तथाकथित मोर्चे में डाल दिया गया था. भाकपा-माले और विधायक सत्यदेव राम का इस मोर्चे से कोई लेना देना नहीं है. हमारी पार्टी भाजपा के आरक्षण विरोधी वास्तविक चरित्र का पर्दाफाश करते रहेगी. भाजपा-जदयू द्वारा आरक्षण पर लगातार हो रहे हमले के खिलाफ हम आरक्षण बचाने वाली ताकतों के साथ मिलकर लड़ाई लड़ते रहेंगे.

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