विश्व हीमोफीलिया दिवस : चोट से परहेज करे हीमोफीलिया रोगी- डॉ. अविनाश
पटना (जागता हिंदुस्तान) पारस एचएमआरआई सुपर स्पेशियिलिटी अस्पताल के कंसल्टेंट हीमोटोलॉजिस्ट डॉ. अविनाश कुमार सिंह के मुताबिक हीमोफीलिया एक अनुवांशिक बीमारी है, जो सिर्फ पुरुषों में होता है। लेकिन कैरियर का काम मां करती है। मतलब रोग मां से बच्चे में जाता है। इस बीमारी में चोट लगने या कटने पर रक्तस्त्राव नहीं रूकता है। इसलिए इस रोग से ग्रसित व्यक्ति को चोट से बचना चाहिए। आम तौर पर किसी के शरीर में कट जाने पर खून का थक्का जमा होता है और रक्त स्त्राव खुद-ब-खुद रूक जाता है। लेकिन हीमोफीलिया से ग्रसित मरीज में ऐसा नहीं होता है। शरीर में एक खास प्रोटीन की कमी की वजह से खून का थक्का नहीं जमता है।
डॉ. अविनाश के मुताबिक खून का थक्का जमने के लिए 13 क्लोटिंग फैक्टर मदद करते हैं। यह माता-पिता के जीन से आता है। हीमोफीलिया तीन प्रकार के होते हैं। ए, बी और सी। फैक्टर-8 की कमी से हीमोफीलिया -ए होता है। फैक्टर-9 की कमी से हीमोफीलिया-बी होता है। फैक्टर-11 की कमी से हीमोफीलिया-सी होता है। लेकिन हीमोफीलिया-सी के मरीज दुर्लभ ही पाए जाते हैं। हीमोफीलिया के लक्षणः चोट लगने या कटने पर रक्तस्त्राव नहीं रूकना, इसका प्रमुख लक्षण है। इस रोग में चोट लगने पर आंतरिक रक्त स्त्राव भी हो सकता है। ऐसे में शरीर के जिस भाग में रक्तस्त्राव होता है वो सूज जाता है। इससे अपंगता भी हो सकती है।
डॉ. अविनाश के मुताबिक रक्तस्त्राव रोकने के लिए कुछ दवाईयां हैं। इसके अलावा जिस क्लॉटिंग फैक्टर की कमी हो, उसका इंजेक्शन मरीज के वजन के हिसाब से दिया जाता है। इससे भी रक्तस्त्राव रूकता है। फैक्टर के नहीं मिलने की स्थिति में फे्रेश फ्रोजेन प्लाज्मा चढ़ाया जाता है। हीमोफीलिया- ए पांच हजार में एक बच्चे में होता है, जबकि हीमोफीलिया- बी 30 हजार में एक बच्चे को होता है।
