पीएम के ‘मंगल’ संबोधन पर बोले शिवानन्द, अब गलतफहमी नहीं रहे कि गरीबों के दुख-दर्द समझते हैं नरेंद्र मोदी

पटना (जागता हिंदुस्तान) लॉकडाउन 4 और आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत 20 लाख करोड़ रूपए के पैकेज की घोषणा वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मंगल’ संबोधन को लेकर राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवानंद तिवारी ने कड़ी टिप्पणी की है. शिवानंद तिवारी ने कहा है कि गांधीजी के गुरुदेव और राष्ट्रकवि रविंद्र नाथ ठाकुर ने कहा है कि ‘सबार ओपरे मानुष:, सबसे ऊपर मनुष्य है. कुछ इसी तरह की बात गांधी जी ने भी कही है ‘मनुष्य सबसे बड़ी कसौटी है.’ परसों प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित किया था. उस संबोधन को अगर मनुष्य की कसौटी पर परखा जाए तो उनके संबोधन में मनुष्य बिल्कुल गैरहाजिर था. कौन मनुष्य? स्मरण कीजिए. पिछले 25 मार्च को बगैर किसी चेतावनी के, बगैर किसी तैयारी के, प्रधानमंत्री जी ने अचानक देश में तालाबंदी की घोषणा कर दी. देश अचानक ठहर गया. सारे काम धंधे बंद हो गए. उसके बाद के दृश्य को याद कीजिए! हजारों लाखों की संख्या में बदहवास प्रवासी श्रमिकों का अपने गांव की ओर कूच करते हुए दृश्य का स्मरण कीजिए. सिर पर गठरी. कईयों के साथ उनके बीवी बच्चे. सब के सब बदहवास चले जा रहे हैं! सड़कों पर कितने मरे. कितनों ने असाध्य और अमानवीय श्रम की वजह से रास्ते में दम तोड़ दिया, इसकी कोई गिनती अभी तक नहीं पाई है. उनकी यात्रा छोटी नहीं थी. हजार किलोमीटर, दो हजार किलोमीटर की अमानुषिक यात्रा! इस अमानवीय और असाध्य यात्रा पर उनको कौन चला रहा था! उनके मन का भय और दहशत उनको धकेले जा रहा था. अपने गांव, अपने घर की ओर. जहां उनको अपनी सुरक्षा का आश्वासन दिखाई दे रहा था.
राजद नेता ने कहा कि शहरों ने जहां वे काम कर रहे थे, वहाँ से उनको दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल दिया था. कई तो बता रहे थे कि उनके मालिकों ने उनके श्रम की कमाई को भी हड़प लिया है. जिन खोलियों में वे ठूंस-ठूंस कर रह रहे थे वहाँ से उनको निकाल बाहर किया गया. इस अमानवीय शहरी व्यवहार ने उनके मन में भय और दहशत पैदा कर दिया. वही भय और दहशत उनको उस असाध्य यात्रा पर धकेले जा रहा था. गांव और घर में सुरक्षा की उम्मीद उनको अपनी ओर खींचे जा रही थी.

शिवानंद तिवारी ने कहा कि हमारे प्रधानमंत्री परसों जब राष्ट्र को संबोधित कर रहे थे तो उनके संबोधन में इन करोड़ों श्रमिकों का जिक्र तक नहीं था. यह कौन लोग हैं जो शहरों से निकलकर गांव की ओर भागे जा रहे थे! अगर इन की सामाजिक पृष्ठभूमि तलाश की जाए तो ये वही लोग हैं जो हजारों वर्षों से उपेक्षित हैं. देश को आजाद हुए 73 वर्ष हो गए.आजाद भारत के संविधान की किताब में दर्ज है कि मनुष्य और मनुष्य के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जा सकता है. हमारे देश के कानून की नजरों में सब बराबर हैं. क्या संविधान में दर्ज यह वायदा, यह सपना 73 वर्षों के बाद भी जमीन पर हकीकत के रूप में दिखाई दे रहा है! इनको इंसान का दर्जा, इंसान की इज्जत प्राप्त नहीं है. और तो और प्रधानमंत्री के भाषण में इनका जिक्र तक नहीं होता है.

उन्होंने नोटबंदी के समय लोगों को हुई समस्या और अफरा-तफरी की याद दिलाते हुए कहा कि देश में तालाबंदी की तरह की तरह ही प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की घोषणा की थी. उसमें भी सिर्फ चार घंटे की नोटिस पर पांच सौ और एक हजार रूपये के सारे नोटों को कागज में तब्दील कर दिया था. प्रधानमंत्री जी के उस समय के राष्ट्र के संबोधन को याद कीजिए! गरीबों को कैसा-कैसा सपना उन्होंने दिखाया था! वायदा किया था कि उनके इस कदम से देश बदल जाएगा. काला धन वाले और देश को लूटने वाले उनके इस कदम से बर्बाद हो जायेंगे और गरीबों के सपनों का देश बनेगा. उस संबोधन के बाद के दृश्य को याद कीजिए. बैंकों में पुराने नोट बदलवाने की लाइनों में मची आपाधापी का स्मरण कीजिए. भीड़ नियंत्रित करने के लिए पुलिस किस तरह से लाइन तोड़ने वालों को बेरहमी से पीट रही थी. जैसे आज बदहवास प्रवासियों श्रमिकों को जहां-तहां पुलिस पीट रही है. नोट बदलने धक्का-मुक्की में डेढ-दो सौ लोग मौत के शिकार हो गए थे. एक महिला को तो कतार में ही बच्चा पैदा हो गया था. मुझे उस स्मरण है कि उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उस बच्चे का नाम खजांची रख दिया था. लेकिन हमारे प्रधानमंत्री जी ने कभी गरीबों की उस यंत्रणा का अपने भाषणों में जिक्र तक नहीं किया था. परसों भी राष्ट्र के नाम उनके संबोधन में प्रवासी श्रमिकों का जिक्र नहीं था!

इसके साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज को लेकर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बुधवार को दिए गए वक्तव्य पर कहा कि इसीलिए कल जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 20 लाख करोड़ के पैकेज का अलग-अलग क्षेत्रों में बंटवारा कर रही थीं तो प्रधानमंत्री द्वारा उपेक्षित प्रवासी श्रमिकों के हिस्से में सिर्फ एक हजार करोड़ रूपए हीआया. जैसे भूखे के सामने रोटी का टुकड़ा फेंक दिया गया हो. प्रवासी श्रमिक कौन हैं ! य़ह सबको मालूम है. देश के पिछड़े राज्य, जो ऐतिहासिक और भौगोलिक कारणों से अपने यहां पर्याप्त संख्या में रोजगार सृजित कर पाने में असमर्थ हैं, उन्हीं के यहाँ से बेरोजगारों का पलायन उन क्षेत्रों में होता है जो अपेक्षाकृत समृद्ध हैं. प्रवासी श्रमिकों के संख्या कितनी होगी ? माना जाता है कि बिहार से ही प्रतिवर्ष लगभग 50 से 60 लाख लोग कमाने के लिए राज्य के बाहर जाते हैं. झारखंड के मुख्यमंत्री का बयान पढ़ा था. उनके अनुसार झारखंड के लगभग छह-सात लाख लोग रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं. इन राज्यों के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश, बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश आदि राज्यों से भी रोजगार की तलाश में नौजवानों का पलायन होता है. कुल मिलाकर प्रवासी श्रमिकों की तादाद करोड़ों में है. दहशत और भय के माहौल में प्रवासी श्रमिकों का बड़ा हिस्सा लौटकर अपने-अपने राज्यों में आ रहा है. राज्यों पर बोझ काफी बढ़ गया है. कोरोना से लड़ाई में भी अगले मोर्चे पर राज्य ही हैं. हम देख रहे हैं कि राज्यों को केंद्र की ओर से अपेक्षित सहायता नहीं मिल रही है. घर लौटे प्रवासी श्रमिकों का अतिरिक्त बोझ भी इन राज्यों पर पड़ा है. प्रवासी श्रमिकों के हिस्से में आवंटित एक हजार करोड़ रुपए का इस्तेमाल कैसे होगा क्या होगा इसको वित्त मंत्री जी ने स्पष्ट नहीं किया है.
कहा जा सकता है कि सरकार की ओर से आर्थिक गतिविधि शुरू करने के लिए जो कुछ किया जा रहा है उसका फायदा तो प्रवासी श्रमिकों को ही मिलेगा. अद्भुत तर्क है. अचानक तालाबंदी का भोग उन्हीं के किस्मत में और जब आर्थिक गतिविधि शुरू हो रही है तो उसका भी बड़ा बोझ उन्हीं को अपने पीठ पर लादा जा रहा है. उन श्रमिकों को अब आठ घंटा नहीं बल्कि बारह घंटा काम करना पड़ेगा. अतिरिक्त घंटा बगैर ओभरटाइम के! इसके अतिरिक्त उनकी सुरक्षा के लिए अब तक जितने नियम बनाए गए थे उन सभी को स्थगित कर दिया गया है. इस संदर्भ में अब किसी को गलतफहमी नहीं रहनी चाहिए कि नरेंद्र मोदी जी पिछड़े हैं. उन्होंने गरीबी झेली है. गरीबों के दुख दर्द को समझते हैं. नरेंद्र मोदी जी इस बार जब राष्ट्र को संबोधित कर रहे थे तो उनके चेहरे की लाली ज्यादा सुर्ख नजर आ रही थी. उनका गमछा बहुत करीने से उनके गले में लपेटा हुआ था ! उनके मेकअप मैन ने बहुत संवार कर उनको कैमरे के सामने बैठाया था. नरेंद्र भाई ने भले ही गरीबी झेली हो लेकिन अब वे अमीरी का आनंद ले रहे हैं.

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